समीर परवेज़
उत्तराखंड के ऊधम सिंह नगर ज़िले में स्थित जसपुर 62 विधानसभा क्षेत्र हमेशा से ही राजनीतिक दृष्टि से अहम रहा है। यहाँ की राजनीति में विकास, जनसमस्याएँ और दलों के बीच सीधा मुकाबला देखने को मिलता रहा है। जैसे-जैसे 2027 के विधानसभा चुनाव नज़दीक आ रहे हैं, जसपुर की सियासत भी धीरे-धीरे गर्माने लगी है।
भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधी टक्कर
जसपुर में मुख्य रूप से भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबला रहता है। जहॉ जसपुर में एक ओर भाजपा विकास, केंद्र व राज्य सरकार की योजनाओं और संगठन की मज़बूती को आधार बना रही है, तो वहीं कांग्रेस स्थानीय मुद्दों, बेरोज़गारी, कानून-व्यवस्था, राशन डीलरो पर राशन न मिलना, युवाओ में बढ़ता नशा, और जनहित से जुड़े सवालों को लेकर सरकार को घेरती नज़र आ रही है।
स्थानीय मुद्दे बने राजनीति का केंद्र
जसपुर क्षेत्र में नशे का बढ़ता कारोबार, युवाओं में बेरोज़गारी, किसानों की समस्याएँ, सड़क, बिजली और पानी जैसे बुनियादी मुद्दे हमेशा से राजनीति का मुख्य आधार रहे हैं। हाल के दिनों में कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक लापरवाही को लेकर भी जनता के बीच चर्चा तेज़ हुई है, जिसका असर आने वाले चुनावों में कांग्रेस और भाजपा को देखने को मिल सकता है।
भाजपा एवं कांग्रेस के नेताओं की सक्रियता बढ़ी
जसपुर क्षेत्र में जनप्रतिनिधियों, विधायक, पूर्व विधायक और राजनीतिक नेताओं की सक्रियता लगातार बढ़ रही है। जनसभाएँ, धरना-प्रदर्शन, सरकारी कार्यक्रमों में भागीदारी और सोशल मीडिया के ज़रिये जनता से संवाद तेज़ हो गया है। इससे साफ़ है कि सभी दल अभी से अपनी राजनीतिक ज़मीन मज़बूत करने में जुट गए हैं।
जनता की भूमिका सबसे अहम
जसपुर की राजनीति में सबसे अहम भूमिका यहाँ की जागरूक जनता निभाती है। अब मतदाता केवल वादों से नहीं, बल्कि ज़मीनी काम और ईमानदार नेतृत्व के आधार पर निर्णय लेना चाहता है। यही कारण है कि राजनीतिक दलों पर जनता का भरोसा जीतने का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। कुल मिलाकर उत्तराखंड राज्य गठन के 25 वर्ष बाद जसपुर की राजनीति एक नए मोड़ की ओर बढ़ रही है। आने वाला समय यह तय करेगा कि जनता कांग्रेस को दोबारा मौका देती है या बदलाव की राह चुनती है। इतना तय है कि जसपुर की सियासत आने वाले दिनों में और भी दिलचस्प होने वाली है।



