आसपा, आप, बसपा और सपा के संभावित प्रत्याशी कांग्रेस-भाजपा के पारंपरिक समीकरण को कर सकते हैं प्रभावित
जसपुर। फन टीवी न्यूज़। रिर्पोट- समीर परवेज़
उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर जसपुर विधानसभा क्षेत्र में राजनीतिक गतिविधियां लगातार तेज होती जा रही हैं। कांग्रेस और भाजपा के बीच मुख्य मुकाबले वाली इस सीट पर अब आम आदमी पार्टी (आप), आजाद समाज पार्टी (आसपा), बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और समाजवादी पार्टी (सपा) के संभावित प्रत्याशियों की सक्रियता भी चुनावी तस्वीर को बहुकोणीय बनाने की दिशा में संकेत दे रही है। यदि ये दल अपने-अपने प्रत्याशियों के साथ चुनाव मैदान में उतरते हैं तो जसपुर में मुकाबला पिछले चुनावों की तुलना में अलग स्वरूप ले सकता है। स्थानीय राजनीतिक चर्चाओं में आसपा की ओर से नईम प्रधान और शाने मिलक, सपा की ओर से इमरान अहमद तथा बसपा की ओर से चरनजीत सिंह चन्नी आप से सूबा सिंह के नामों को लेकर सक्रियता की चर्चा है। वहीं आम आदमी पार्टी के सूबा सिंह की उम्मीदवारी को लेकर गतिविधियां बढ़ा चुकी है। हालांकि 2027 के लिए अंतिम प्रत्याशियों की आधिकारिक तस्वीर चुनावी प्रक्रिया और संबंधित दलों के निर्णय के बाद ही स्पष्ट होगी।
2022 में कांग्रेस और भाजपा के बीच रहा था मुख्य मुकाबला
जसपुर विधानसभा सीट के पिछले चुनावी परिणामों पर नजर डालें तो वर्ष 2022 में कांग्रेस के आदेश सिंह चौहान ने 42,886 वोट हासिल कर भाजपा के डॉ. शैलेंद्र मोहन सिंघल को 4,172 वोटों के अंतर से हराया था। उपलब्ध चुनावी आंकड़ों के अनुसार आम आदमी पार्टी के मोहम्मद यूनुस चौधरी को 9,454 और बसपा के अजय अग्रवाल को 5,061 वोट मिले थे। सपा प्रत्याशी जमील अहमद मंसूरी को 364 वोट मिले थे। इन आंकड़ों से यह स्पष्ट होता है कि 2022 में कांग्रेस और भाजपा के बीच अंतर बहुत बड़ा नहीं था, जबकि अन्य दलों के प्रत्याशियों को भी अलग-अलग मात्रा में मत मिले थे। ऐसे में 2027 में यदि अधिक राजनीतिक दल मजबूत उम्मीदवारों के साथ मैदान में उतरते हैं तो प्रत्येक प्रत्याशी को मिलने वाले मतों का वितरण चुनाव परिणाम के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकता है।
आसपा की सक्रियता बढ़ी
आजाद समाज पार्टी की ओर से जसपुर क्षेत्र में नईम प्रधान की राजनीतिक सक्रियता पिछले कुछ समय से दिखाई दे रही है। अगस्त 2026 में उनके जनसंपर्क अभियान और विभिन्न गांवों में सभाओं की जानकारी सामने आई थी। सितंबर में नईम प्रधान ने दिल्ली में चंद्रशेखर आजाद से मुलाकात कर जसपुर की राजनीतिक स्थिति पर चर्चा किए जाने की जानकारी भी सामने आई। नईम प्रधान की लगातार क्षेत्रीय गतिविधियों को देखते हुए आसपा की ओर से उनकी दावेदारी चर्चा में बनी हुई है। वहीं शाने मिलक का नाम भी आसपा की संभावित दावेदारी को लेकर स्थानीय राजनीतिक चर्चाओं में सामने आ रहा है। यदि पार्टी इनमें से किसी एक नाम को अंतिम रूप देती है और संगठन चुनाव तक सक्रिय रहता है तो जसपुर में आसपा के प्रदर्शन पर भी राजनीतिक दलों की नजर रहेगी।
आप के सामने संगठन को चुनावी ताकत में बदलने की चुनौती
2022 में आम आदमी पार्टी के प्रत्याशी मोहम्मद यूनुस चौधरी ने 9,454 वोट हासिल किए थे, जो जसपुर के चुनावी समीकरण में एक उल्लेखनीय आंकड़ा था। 2027 में आप यदि नए संगठनात्मक ढांचे के साथ मैदान में उतरती है तो उसके पिछले प्रदर्शन को आधार बनाकर राजनीतिक पर्यवेक्षक यह देखने की कोशिश करेंगे कि पार्टी अपने पुराने मतदाताओं को कितना बनाए रख पाती है और नए मतदाताओं तक कितनी पहुंच बना पाती है।
सपा की संभावित एंट्री से बढ़ सकती है राजनीतिक सक्रियता
समाजवादी पार्टी की ओर से इमरान अहमद की संभावित दावेदारी की चर्चा भी जसपुर के राजनीतिक हलकों में है। सपा यदि यहां पूरी ताकत के साथ प्रत्याशी उतारती है तो उसके सामने स्थानीय संगठन को सक्रिय करने और अपने पक्ष में प्रभावी जनाधार तैयार करने की चुनौती होगी। पिछले चुनाव में सपा का प्रदर्शन सीमित रहा था, लेकिन 2027 में नए चेहरे और अलग चुनावी परिस्थितियों के बीच पार्टी किस तरह का प्रदर्शन करती है, यह चुनाव के दौरान ही स्पष्ट होगा। सपा की मौजूदगी बहुकोणीय मुकाबले में एक अतिरिक्त राजनीतिक विकल्प उपलब्ध करा सकती है।
बसपा भी तलाश रही अपना आधार
बसपा की ओर से चरनजीत सिंह चन्नी की संभावित दावेदारी की चर्चा है। 2022 में बसपा के अजय अग्रवाल को 5,061 वोट मिले थे। यदि 2027 में बसपा मजबूत स्थानीय चेहरे के साथ मैदान में उतरती है तो पार्टी के लिए अपने पारंपरिक सामाजिक आधार को सक्रिय करने के साथ-साथ नए मतदाताओं तक पहुंच बनाना महत्वपूर्ण होगा। बसपा और आसपा दोनों की अलग-अलग मौजूदगी की स्थिति में दोनों दलों के प्रदर्शन को लेकर भी राजनीतिक विश्लेषण का एक महत्वपूर्ण पहलू सामने आएगा।
कांग्रेस-भाजपा के लिए भी बदल सकता है चुनावी समीकरण
जसपुर में कांग्रेस और भाजपा लंबे समय से प्रमुख राजनीतिक ताकतों के रूप में चुनावी मुकाबले में रही हैं। 2022 में दोनों के बीच केवल 4,172 वोट का अंतर रहा था। ऐसे में 2027 में यदि आसपा, आप, बसपा और सपा अपने-अपने प्रत्याशी उतारते हैं तो चुनावी मैदान में मतों का वितरण कई दिशाओं में हो सकता है। हालांकि यह कहना अभी संभव नहीं है कि इसका सीधा लाभ या नुकसान किसी एक दल को होगा। प्रत्येक दल का प्रभाव उसके प्रत्याशी, स्थानीय संगठन, चुनावी मुद्दों, प्रचार अभियान और मतदाताओं के अंतिम रुझान पर निर्भर करेगा।
उम्मीदवारों के चेहरे बनेंगे महत्वपूर्ण फैक्टर
2027 के चुनाव में जसपुर की राजनीति में पार्टी से अधिक स्थानीय प्रत्याशियों की व्यक्तिगत पकड़ भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। क्षेत्र में लगातार जनसंपर्क, सामाजिक गतिविधियां, स्थानीय मुद्दों पर सक्रियता और संगठन की बूथ स्तर तक मौजूदगी किसी भी प्रत्याशी के चुनावी प्रदर्शन को प्रभावित कर सकती है। आसपा से नईम प्रधान या शाने मिलक, सपा से इमरान अहमद तथा बसपा से चरनजीत सिंह चन्नी आप से सूबा सिंह जैसे नाम यदि आधिकारिक प्रत्याशियों के रूप में सामने आते हैं, तो इन सभी के सामने अपनी-अपनी राजनीतिक पहचान को मतदाताओं तक पहुंचाने की चुनौती होगी। दूसरी ओर कांग्रेस और भाजपा को भी अपने संभावित प्रत्याशियों और संगठन के जरिए मतदाताओं के बीच अपनी स्थिति मजबूत करनी होगी।
स्थानीय मुद्दों पर टिकेगा चुनाव
जसपुर विधानसभा क्षेत्र में 2027 के चुनाव के दौरान विकास, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, किसानों से जुड़े मुद्दे, कानून-व्यवस्था, नगर और ग्रामीण क्षेत्रों की मूलभूत सुविधाएं तथा युवाओं से जुड़े सवाल प्रमुख चुनावी विषय बन सकते हैं। इसके साथ ही प्रत्याशियों की व्यक्तिगत छवि और क्षेत्र में उनकी सक्रियता भी मतदाताओं के निर्णय को प्रभावित करने वाले कारकों में शामिल हो सकती है। फिलहाल चुनाव में कई महीने बाकी हैं और प्रत्याशियों की अंतिम सूची सामने नहीं आई है। इसलिए वर्तमान राजनीतिक गतिविधियों को दावेदारी और संभावित चुनावी तैयारी के तौर पर ही देखा जा रहा है। आने वाले महीनों में जैसे-जैसे दल अपने उम्मीदवार घोषित करेंगे और प्रचार अभियान तेज होगा, जसपुर विधानसभा की वास्तविक चुनावी तस्वीर और अधिक स्पष्ट होती जाएगी।
ऐसे में 2027 का जसपुर विधानसभा चुनाव कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधे मुकाबले के साथ-साथ अन्य दलों की भूमिका के कारण बहुकोणीय राजनीतिक मुकाबले का रूप ले सकता है। हालांकि किस दल को कितना समर्थन मिलता है और अंतिम परिणाम क्या रहता है, इसका आकलन अभी करना जल्दबाजी होगी।





